मेनारिया समाज का संक्षिप्त इतिहास

मेनारिया समाज का संक्षिप्त इतिहास 1

समाज के बारे मैं

मेनारिया ब्राह्मण मूलतः मेवाड़ की प्राचीनतम राजधानी नागदा नगर (एकलिंगजी) के निवासी हैं । दिल्ली के सुल्तान अल्तमश के विरूद्ध गोगुन्दा के निकट भूताला ग्राम के निर्णायक युद्ध में मेवाड़ शासक जैत्रसिंह की सेना परास्त हुई थी। इसके पूर्व हुई नागदा की लड़ाई मंे जैत्रसिंह के प्रधान सेनापति एवं तत्कालीन मंत्री वीर धवलाके मुस्लिम सैन्य बल का वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया, जिसमें नागदा के ब्राह्मण भी मातृृभूमि की रक्षार्थ शहीद हुए।

इस युद्ध (सन् 1226 ई. नागदा-भूताला ) के बाद नागदा से एवं अन्यत्र बसने लगे जो सालेरा, आहड़, गोगुन्दा, घासा में, ये ब्राह्मण नागदा तथा जैसलमेर व बाद में पाली में बसने से पालीवाल एवं मेनार ग्राम में जा बसने से मेनारिया ब्राह्मण के नाम से विभक्त हो गये। नागदा से निकले महाजन भी अपनी जाति के साथ नागदा एंव पालीवाल अपनी जातीय पहचान के लिए वाचक शब्द लागाते है।

मेनारिया ब्राह्मण मूलतः मेवाड़ की प्राचीनतम राजधानी नागदा नगर (एकलिंगजी) के निवासी हैं। दिल्ली के सुल्तान अल्तमश के विरूद्ध गोगुन्दा के निकट भूताला ग्राम के निर्णायक युद्ध में मेवाड़ शासक जैत्रसिंह की सेना परास्त हुई थी। इसके पूर्व हुई नागदा की लड़ाई मंे जैत्रसिंह के प्रधान सेनापति एवं तत्कालीन मंत्री वीर धवलाके मुस्लिम सैन्य बल का वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया, जिसमें नागदा के ब्राह्मण भी मातृभूमि की रक्षार्थ शहीद हुए। इस युद्ध (सन् 1226 ई. नागदा-भूताला ) के बाद नागदा से एवं अन्यत्र बसने लगे जो सालेरा, आहड़, गोगुन्दा, घासा में, ये ब्राह्मण नागदा तथा जैसलमेर व बाद में पाली में बसने से पालीवाल एवं मेनार ग्राम में जा बसने से मेनारिया ब्राह्मण के नाम से विभक्त हो गये। नागदा से निकले महाजन भी अपनी जाति के साथ नागदा एंव पालीवाल अपनी जातीय पहचान के लिए वाचक शब्द लागाते है।

मेनारिया शब्द का प्रथम प्रामाणिक साक्ष्य जिला चितौड़ के छोटी सादड़ी के भँवर माता के वि.स. 547 (ई. सन् 490) के शिलालेख में मिलता है।

डाॅ दशरथ शर्मा ने “राजस्थान थू्र दी एजेज ” पुस्तक के प्रथाम खण्ड पृ.26 में लिखा है कि “मनुवानिया नामक ब्राह्मण वर्ग का मेवाड़ में शासक था।” सम्भवतः मनुवानिया लोग मध्यप्रदेश में उज्जेन धार से मेवाड़ में चितौड़ एवं नागदा तक विस्तृत क्षेत्र पर शासन करते रहे होंगे। कालान्तर में गुहिल वंशज शासकों में बाप्पा रावल को आपात काल में नागदा में रहने वाले मेनारिया ब्राह्मणों में संरक्षण प्रदान किया। इसी कारण तत्कालीन हारीत ऋषि (सम्भवतः हारीत मेनारिया ब्राह्मण ऋषि हो जो उस विख्यात रसायन चिकित्सक एवं चाणक्य की भांति राजनीति शास्त्र का ज्ञाता था) ने बाप्पा रावल को उसी प्रकार सहायता प्रदान कर मेवाड़ का शासक बनाया जैसे – चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को उसके पूर्वजों का राज्य नन्द शासको से छीन कर दिलाया । हारीत ऋषि एवं बाप्पा रावल के संबंध का मेवाड़ का राजनीतिक एंव सांस्कृतिक इतिहास में बड़ा महत्व हैं। मेवाड़ के शासकों ने तभी से हारीत ऋषियों को अपना गुरू एवं नागदा में रहने वाले ब्राह्मणों को समय-समय पर सम्मानित कर उन्हें कई ग्रामों की भूमि दान में दी।

कर्नल जेम्स टाड ने मेवाड़ के मेनारिया के इतिहास का वर्णन अपनी पुस्तक “एनाल्स एण्ड एन्टीक्वीटीज ऑफ़ राजस्थान ( राजस्थान का इतिहास ऐतिहासिक यात्रा- पृ. 964-968) में किया है। यह एक रोचक वृतांत है। टाॅड ने लिखा कि गुप्तकाल के कही पहले राजा विक्रमादित्य (द्वितीय) की राजधानी धार और उज्जैन पर कभी मांधाता नामक राजा का शासन था। उसके साम्राज्य में चित्तोड़, मेनाल, नगरी एवं नागदा के मेनारिया लोगों का बोलबाला था। मांधाता ने मेनारिया ब्राह्माणों को ममेनार में (जिसे टाॅड- खेरोदा के अन्तर्गत – अमरपुरा ग्राम के पास स्थित बताया है) 52 हजार बीध्घा भूमि दान में दी थी। टाॅड ने प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से यह पाया कि हींता- ढूढिया नाम स्थान के ब्राह्मणों का मालवा के प्रसिद्व राजा मांधाता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था, जहां उसने एक अवश्मेघ यज्ञ किया। उसी यज्ञ के समय मेनारिया ब्राह्मणों को मेनार तथा उसके आस-पास भूमि दान में मिली। टाॅड लिखता है कि हजारों वर्षों से मेवाड़ के मेनारिया ब्राह्मण मेनार व उसके आस-पास की विस्तृत भूमि के स्वामी थे। क्योंकि परम्परानुसार उस भूमि को मेवाड़ के शासकों ने भी मांधाता द्वारा भूमि पर अधिकार मानकर समय-समय पर ताम्रपत्र प्रदान कर मेनारियों को ही स्वामित्व सौंपा। कर्नल टाॅड ने अपनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक यात्रा के समय खेरोदा में रुक कर मेनार और मेनारिया ब्राह्मणों गौरवपूर्ण इतिहास की जानकारी की थी।

इस प्रकार पौराणिक परम्पराओं और ऐतिहासिक प्रमाणों से यह सिद्ध होता कि मेनार ग्राम मेनारियों का मूल निवास स्थान था, जिसे त्रेता युग में राजा मांधाता ने यह ग्राम और उसमें रहने वाले ब्राह्मणों को हजारों बीघा भूमि प्रदान की थीं महाराणा भीमसिंह के समय मेवाड़ पर 18वीं सदी में मराठों के आक्रमण होते रहते थे, साथ ही मेवाड़ में गृृह-कलश चरम सीमा पर था। राज्य में शक्तावतों का प्रभुत्व बढ़ने से हींता व उसके निकटवर्ती ब्राह्मणों के प्रदŸा भूमि पर शक्तावतों ने अधिकार कर लिया यद्यपि मेवाड़ के महाराणा मेनारिया ब्राह्मणों को दान में दी गयी भूमि पुनः अधिग्रहीत करने के पक्ष में नहीं थे। टाॅड लिखता है िकइस भूमि पर राज्य का अधिकार कैसे हो कि राणा को मेनारिया ब्राह्मणों को दी गयी भूमि पुनः लने का पाप ने लगे व ब्राह्मणों के देय भूमि से कृषि उत्पादन न रुक सके, मेवाड़ दरबार में रेजिडेन्ट टाॅड ने एक प्रस्ताव रख कि यदि महाराणा आवश्यकतानुसार मेनार की भूमि मेनारिया ब्राह्मणों को दे और शेष भूमि पर राज्य सरकार हो ’याने उसे खालसे (राज्य द्वारा हड़पना) कर ली जावें। ऐसा करने से जो पाप होगा, या मरने के बाद नरक का दण्ड होगा, टाॅड ने अपन ऊपर लेने की बात कही। इस प्रस्ताव का मेवाड़ दरबार में एक प्रसिद्ध दरबारी द्वारा, जो ज्योतीषी व वैद्य भी था, विरोध किया। इस कारण मेनार में राज्य द्वारा दान में दी गयी भूमि पर मेवाड़ क महाराणा ने ब्राह्मणों का ही अधिकार स्वीकार किया।

उपरोक्त विवरण का विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर “मेनारिया ब्राह्मण समाज” का इतिहास के अध्ययन करने से यह प्रतीत होता हेै कि जनमेजय के नागयज्ञ की घटना या राजा तक्षक द्वारा नागजाति का एकलिंगजी के पास नागदा में दमन किया, जहां नागदा नगर के आज भी प्राचीन खण्डहर हैं – नागादित्य द्वारा स्थापित नागदा में मेवाड़ की राजधानी नागदा थी, वहीं कभी मेनारिया ब्राह्मणों ने बाप्पा रावल को संरक्षण दिया, जिससे मेवाड़ के शासकों ने नागदा के ब्राह्मणों को प्रशासन में महत्व दिया हो – हारीत ऋषि के आशीर्वाद से मेवाड़ राजवंश की प्रतिष्ठा भारतवर्ष में बढ़ीं। इसी कारण संकट के समय मेनारिया ब्राह्मणों ने राज्य एवं देश हित में सर्वोच्च त्याग कर सनातन मूल्यों की रक्षा की । परन्तु पुनः 1216 ई. में भूताला युद्ध (गोगुन्दा के निकट) के बाद नागदा से अन्यत्र बसने वाले ब्राह्मणों -नागदा, पालीवाल एवं मेनारिया नाम से ही जाने जाते हों, परन्तु उनका मूल निवास स्थान नागदा ही है – अतः भारत के सभी प्रान्तों व भू-भागों में बसे इन समस्त ब्राह्मणों को नागदा एवं मेनार – चीरवा ग्राम के महत्व की जानकारी होनी चाहिये। भले ही वे अपने उपनाम में मेनारिया, जोशी, पानेरी, मेहता, मुरोहित, व्यास लगाते हों। वस्तुतः मेवाड़ के मेनारिया ब्राह्मणों ने बाप्पा रावल, जैत्रसिंह, मथनसिंह, उदयसिंह, प्रताप, राजसिंह एवं अन्तिम महाराणा के समय तक राजभक्ति तथा राष्ट्रभक्ति तथा सनातन मूल्यों की रक्षा में अहम् भूमिका का निर्वाह किया।

एक संक्षिप्त परिचय