ब्राह्मण

चार वर्णों में ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है क्योंकि ब्राह्मणत्व एक बहुत बड़ी उपलब्धि है | ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ही ब्राह्मण वर्ण नहीं कहा जा सकता है |

कहा गया है कि :

जन्मना जायते शुद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते |
वेदाभ्यासाभ्दवेद्विपप्रो ब्रह्म जानाति ब्राह्मण ||

अर्थात जन्म से बालक शुद्र उत्पन्न होता है संस्कारो से वह द्विज (मतलब दूसरा जन्म) कहलाता है , वेदव्यास से वह विप्र होता है और ब्रह्म ज्ञान से ब्राह्मण कहलाता है ?

ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के विषय में याज्ञवल्क्य ने कहा है

सर्वस्य प्रभावों विप्राः श्रुताध्ययनाशालीन: |
तेभ्य: क्रियाम्परा: श्रेष्ठास्ते भ्योSप्यध्यातम वितत्या ||

अर्थात सभी में वह विप्र श्रेष्ठ है जिसने श्रुतियो का अधययन किया हो , उसमे भी उनके अनुसार आचरण करने वाला श्रेष्ठ है और ज्ञान निष्ठ सबसे श्रेष्ठ है |

ब्राह्मणों की उपजातिया

प्रारंभ के ब्राह्मणों की एक ही जाती हुआ करती थी | कालांतर में ब्राह्मण विभिन्न स्थानों पर जा कर बस गए | उनके स्थान और भेद, धरम, भोजन और वैदिक शाखा के कारन गुप्त काल में कई उपजातिया बन गई |

नवमी शाताब्दी में ब्राह्मणों में पंच गोड और पंच द्रविड़ नामक दो स्पस्ट वर्ग ऊपर कर सामने आये | प्राचीन काल ने ब्राह्मण सम्पूर्ण भारत में फैले हुए थे, किन्तो अधिंकाश ब्राह्मण उत्तर भारत के मैदानी प्रदेशो में रहते थे | आर्यों के भारत आवागमन से बहुत काल तक इन ब्राह्मणों और आर्यों में सभ्यता और सांस्कृतिक समन्वय नहीं हो पाया | इसका कारण यह रहा कि प्राचीन ब्राह्मणों की सभ्यता और संस्कृति चरमोत्कर्ष पर थी | आर्य भी आपने आप को श्रेष्ठ मानते थे, परन्तु आर्य प्राचीन द्रविड़ ब्राह्मणों से बहुत ग्रणा करते थे | आर्यों से संपर्क के कारण सभ्यता और सांस्कृति हास हुआ तथा आर्यों द्वारा द्रविड़ की समन्वित सभ्यता का उदय हुआ, जिसको भी एक आर्य सभ्यता का ही रूप माना जाने लगा | आर्यों के उत्तरी भारत में निरंतर प्रसार से अधिंकाश ब्राह्मणों का आर्य सभ्यता से समन्वय न होने के कारण वे सभी दक्षिण भारत की और चले गए | साथ में दक्षिण के राजा और महाराजाओं ने यज्ञ करने के लिए भी इन्होने आमंत्रित किया तथा इन्हे यही बसा दिया | कई ब्राह्मण अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए दक्षिण भारत में जा कर बस गए , जहा पर इनकी सभ्यता विकशित हुई | किन्तु आर्यों के प्रभाव से वंचित नहीं रह सकी और फिर एक मिली जुली सभ्यता का विकास हुआ |

यह सभ्यता भारतीय सभ्यता के नाम से विख्यात हुई, जिसमे कई जातीय और सभ्यताओ का मिश्रण था, जिसकी आज के अनुसार पहचान करना मुस्किल है | जाति की द्रस्थी से भी इनका इतना मिश्रण हो गया है कि आज किसी भी जाती को शुद्ध जाती कहना बहुत कठिन है |

कालांतर में इनके दो वर्ग हो गए | हिमालय से विन्ध्याचल के मध्य रहने वाले सांस्कृतिक ब्राह्मण पंच गोड कहलाए क्योंकि इनका प्रमुख स्थान गोड प्रदेश था तथा विन्ध्याचल से कन्याकुमारी तक बसने वाले ब्राह्मणों पंच द्रविड़ कहा जाने लगा | बाड़ में स्थान एवं आचार भेद के कारण इनकी उपजातिया बनती चली गयी |

सर्वप्रथम अलग अलग स्थानों पर रहने के कारण दस उपजातिया बनी अर्थात विन्ध्याचल से उत्तर में बसने वाले ब्राह्मण सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड़, उत्कल और मैथिल नाम से पंच गौड़ कहलाये | विन्ध्याचल से दक्षिण में बसने वाले कर्णाटक, तैलंग , महारास्ट्र, तथा गुर्जर देश ( गुजरात ) में बसने वाले ब्राह्मण पंच द्रविड़ कहलाये |