वैदिक संस्कृति में मानव जीवन के आरम्भ से अंत तक बहुत सारे संस्कारों को उत्पन्न करना आवश्यक है | मानव में गुणों में वृद्धि और अवगुणों का नाश करने वाली सभी क्रियाओ को ही संस्कार कहते है |

विभिन्न संस्कारो को वैदिक मंत्रो द्वारा निर्धारित समय समय पर उत्पन्न किये जाते है |

प्रारंभ में 48 संस्कार थे, मगर जैसे जैसे समय बीतता चला गया, इनकी संख्या सिमित हो गयी | वर्त्तमान में 16 संस्कार संपन्न किये जाते है | इनको भी दो भागो में बाट दिया गया है | प्रथम आठ संस्कार प्रवति मार्ग और अंतिम आठ संस्कार निवृति मार्ग में सहायक है |

गर्भधारण संस्कार

ऋतुकाल आने पर विधिपूर्वक ऋतुदान के पश्चात स्त्री गर्भाशय रूपी भूमि पर बीज से सम्बंदित विकारो तथा गर्भ में होने वाले रोगों का विनाश करने के लिए गर्भधारण संस्कार के मंत्र विधि द्वारा किया जाता है |

पुंसवन संस्कार

गर्भ स्थिति ज्ञान समय से दुसरे व तीसरे महीने मे इच्छति संतान प्राप्ति हेतु विभिन्न वैदेक मंत्रो उच्चारण के द्वारा इस संस्कार को संपन्न किया जाता है |

सीमान्तोन्नयन संस्कार

गर्भिणी स्त्री का मान संतुस्ट, शरीर आरोग्य, गर्भ स्थिर हो कर शिशु के निर्माण और चेतना रूपी रक्षार्थ से चोथे महीने में शुक्ल पक्ष में , पुनर्वसु , मूल श्रवन, पुष्प, अनुराधा, अश्निनी नक्षत्र हो उसी दिन पुरे विधि पूर्वक इस को पूर्ण किया जाता है |

जात – कर्म संस्कार

बालक या बालिका के जन्म होते ही इस संस्कार को पूर्ण किया जाता है | इसमे जातक के शरीर का जरायु पृथक कर के मुख, कान, आदि, के मल दूर करके नदी छेदन करा और बाड़ में गर्म जल से स्नान करा कर जन्मे शिशु को शुद्ध किया जाता है | जात कर्म संस्कारो को वैदिक मंत्रो से किया जाता है |

नामकरण संस्कार

जन्म के दस दिन पश्चात निर्धारित समय पर जातक की आयु, ओज की अभिवृद्धि और व्यहार सिद्धि हेतु निर्दिष्ट विभिन्न मंत्रो के द्वारा अपने परिजनों के सम्मुख नामकरण किया जाता है | बालक का नाम समक्षर और कन्या का नाम विषमाक्षर होता है |

निष्क्रमण संस्कार

बालक को समय, स्थान की उपयोगिता और शुद्ध वातावरण की स्थिति में भ्रमण हेतु प्रथम बार घर से बाहर ले जाते है | सूतिका और शास्त्रों के अनुसार द्वतीय व तृतीय स्नान के मध्य समय में प्रकाशकीय वास्तुये जैसे चांदी, अग्नि, तारे , चन्द्र, जल, सूर्ये , आदि को दिखाया जाता है | दिर्गायु के लिए एस संस्कार को किया जाता है |

अन्नापशन संस्कार

प्राशित अन्न द्वारा तेज, बल वृद्धि के विकास के लिए छठे मास अथवा अन्न पचाने की क्षमता होने पर मंत्र एवं विधान के अनुसार इस संस्कार को पूरा किया जाता है |

चुड़ाक्रम संस्कार

शिशु के गर्भ – स्थिति समय के केशो का मुंडन किया जाता है | यह मुंडन सस्कार पहले अथवा तीसरे वर्ष में उत्तरायण काल , शुक्ल पक्ष के मुहर्त में किया जाता है | इसके लिए पुनर्वसु , पुष्य ज्येष्ठा , मर्ग शिरा, श्रवण, धनिस्ठा, चित्रा, स्वाति, रेवती नक्षत्र उत्तम माने गए है | मुंडन संस्कार 1, 7, 8, 9, 13, 14, 15 और 30 को नहीं कराया जाता है |

मुंडन संस्कार में सबसे पहले गणपति पूजन, पंच भू संस्कार कर ब्रह्मा , आचार्य का पूजन करके वरन किया जाता है | नो आहुतियो एवं स्विस्ट कृत हवन करके केश को माखन , दही की मलाई से जल सहित भिगोकर कंधी कर के केंची अथवा उस्तरे के साथ कुशा ले कर मुंडन संस्कार को पूर्ण किया जाता है |

कर्णवेध संस्कार

तीसरे या पांचवे वर्ष में बालक की रक्षा , शिक्षा और भूषा – भूषण हेतु कर्ण अथवा नासिका वेध संस्कार सुश्रुत ज्ञानी हाथो से कराया जाता है |

उपनयन संस्कार

शिक्षा , भाषा विद्या और आचार श्रेष्ठता के लिए यह सर्वाधिक एवं विस्तृत संस्कार है |

वेदारम्भ संस्कार

बालक को स्वशाखा के अनुसार ज्ञान प्रदान तथा शिक्षित किया जाता है | विद्या अध्ययन काल में ब्रह्मचर्य की पालना की आज्ञा है | ब्राह्मण बालको को वेदारम्भ संस्कार गायत्री मंत्र से लेकर वेदों सांगोपांग अध्ययन का नियम लेना होता है | इसका प्रारम्भ उपनयन संस्कार के दिन से लेकर एक वर्ष के भीतर हो जाना चाहिए |

केशांत संस्कार

उपनयन के एक वर्ष बाद से जब जब बाल बढ़ जाते है , तब विधि विद्यान से इस संस्कार को पूरा किया जाता है |

समावर्तन संस्कार

ब्रह्मचर्य व्रत की पालना करना , उत्तम शिक्षा और पदार्थ विज्ञान को पूरी तरह प्राप्त करने पर विधिपूर्वक गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने तथा समस्त सुखों एवं लाभों को प्राप्त करने के लिए इस संस्कार को किया जाता है |

विवाह संस्कार

यह संस्कार विस्तृत , व्यापक और बहुत महत्वपूर्ण है | ब्रह्मचर्या अवस्था के 25 वर्ष पूर्ण होने के बाड़ में पुरुष अपने वर्णाश्रम के अनुकूल स्त्री की आयु 18 वर्ष की होने पर धर्म बीज संस्कारो , यज्ञो आदि की सिद्धि तथा स्वर्ग प्राप्ति के निमित यह विवाह संस्कार संपन्न करता है | हमारे यहाँ पर प्रचलित ब्रह्मविवाह पद्दति के अंगीभूत विवाह से पूर्व वाग्दान संस्कार और विवाह के उपरांत चतुर्थीक्रम संस्कार भी विधि विधान उच्चारणों के द्वारा संपन्न किये जाते है |

अग्नि परिग्रह संस्कार

विवाहित व्यक्ति सपत्नी अवस्था में ग्रस्थआश्रम की श्रेस्ठताओ के लिए अग्याधन संस्कार करता है | जिसमे अरणी मंथन द्वारा त्रिविध अग्नि स्थापित की जाती है तथा नित्य हवन किया जाता है | अग्नि नस्ट हो जाने पर पुनः उसी प्रकार अग्नि मंथन कर विधान से स्थापित किया जाता है |

त्रेताग्नी – संग्रह

द्विज के धर में स्थापित अग्निहोत्र शाला से जुड़े दो अलग कमरे होते है | इसके वैदिक और तांत्रिक दोनों विधान है | इस संस्कार में पत्नी की उपस्थिति आवश्यक है | अग्निमय जगत के स्त्री पुरुष संस्कार वश एक होकर ग्रहस्त चलाते है | जीवन के उपरांत भी शव -दाह के लिए घर से अग्नि को ले जाने का विधान प्रचलित है जिसको गार्हपत्य अग्नि कहते है |