सिद्द इतिहासकार श्यामलदास जी ने मेवाड के गावों के सर्वेक्षण में मेनारिया ब्राह्मणों के विभिन्न गोवों का उल्लेख मिलत है |

गाँव मेंनार :

मेंनार गाँव के इतिहास का के अनुसार अति प्राचीन काल के पोराणिक राजा माधांता ने एक यज्ञ के समय प्रसन्न हो कर ब्राह्मणों को 52000 बीघा जमीन दान में दी थी | यह तभी से मेनारियो का प्रसिद्द गाँव माना जाता है | यहाँ के रहने वाले ब्राह्मण मेनारिया कहे जाते है |

मेंनार में आरम्भ में चार कुल थे जिनमे सोमा , लुणा , भीखा और नाखा थे, जिसमे सोनावत , लुणावत, भीखावत और नाथावत आदि कुल का वंश विकसित हुआ | महाराजा सज्जनसिंह के समय मेनार गाँव में 2500 बीघा भूमि मेनारियो के अधिकार में थी, जिसका उस समय कुल राजस्व 7000 रुपये के बराबर था |

ईटाली :

इस गाँव में मेनारियो की 25 घर थे | इस गाँव में चारभुजा जी का प्राचीन मंदिर स्थित है | यह गाँव राना मोकल के समय ( सन 1421-1433 इसवी) से पीढ़ी दर पीढ़ी मेनारिया ब्राह्मणों का बहुल क्षेत्र रहा है | गाँव में 18 घर भीलो के, 2 सुनार, 4 नाई, 3 धोबी, 4 माली, 4 कलाल, 9 कुम्हार और 5 घर सेवक जाती के थे |

गिर्वा :

उदयपुर नगर का अन्दर का भाग गिर्वा के नाम से जाना जाता है , जिसमे मेनारिया, पानेरी , नागदा , पुरोहित , पालीवाल , जोशी आदि लोग रहते थे | यह सभी लोग महाराणा उदय सिंह के समय से अन्य जाती वर्ग के लोगो के साथ स्नेह और प्रेम पूर्वक रहते आ रहे है | मेनारिया ब्राह्मण पानेरियों की मादडी, भुवाणा ,बेदला और नजरबाग़, आहड़ आदि क्षेत्रो में रहते है | उदयपुर मेवाड के महाराणा भीम सिंह के समय मेनारिया जाती के कुछ लोग राज परिवार के पण्डेरे से जुड़े थे, जो की राणा के महल में और यात्रा आदि के समय इनके हाथो का ही पानी ग्रहण किया करते थे | उनकी राजा भक्ति एवं सेवा से प्रसन्न होने के कारण राणा ने टेकरी के पूर्व दिशा में उन्हें उपजाऊ भूमि प्रदान की जो की आज के समय में पानेरियों की मादडी के नाम से जाना जाता है | इस को गिर्वा का मुख्य गाँव कहते है |

खेरोदा :

क़स्बा खेरोदा में मेनारिया के 29 घर थे | मेनारिया ब्राह्मण गाँव खेरोदा में रहने वाले अन्य में एक घर छिपा, 1 घर रंगरेज , एवं 15 मुस्लिम घरो का भी उल्लेख मिलता है | गाँव वाना में नागदा जोशी के 5 घर और मोजा बासडा में 3 घर थे |

गाँव गरवाडी :

राणा रायमल के समय से बसा हुआ गाँव गरवाडी फतहनगर एवं दरीबा के बीच में एक उपजाऊ क्षेत्र है | यहाँ पर प्रारंभ से ही मेनारिया ब्राह्मणों की बस्ती रही हुई है | पोराणिक परंपरा अनुसार सुर्वंशी राजा माधांता के तीन पुत्र थे, जिनके नाम पुरुकुत्स, अम्बरीष और मुचकुंद |
अम्बरीष ऋषि का पुत्र युवनास्व और उसका पुत्र हारित हुआ जिसके वंशज आन्गिरस हारित कहलाये और इसी कारण हारित गोत्री ब्राह्मण हुए | जहां तक यहाँ के ब्राह्मणों के गोत्र का सम्बन्ध है गरवाडी के मेनारिया नागदा में रहने वाले हारित गोत्री थे जो की राणा कुम्भा के पुत्र रायमल के शासन काल (सन 1473 – 1482 इस्वी ) में गरवाडी में आ कर बस गए थे | रायमल ने इस गाँव से लगी 3700 बीघा भूमि में से 2000 बीघा भूमि मेनारिया ब्राह्मणों को प्रदान की, जो की रायमल के प्रपिता श्री मोकल के समय से दी गई थी | इस तरह से गाँव की प्राचीनता का पता चलता है |

खरसाण :

इस गाँव में ज्यादातर मेनारिया ब्राह्मण रहते है | महराणा प्रताप के पिता उदयसिंह ने चित्तोड त्याग कर उदयपुर बसाने के पूर्व ही मेनारिया ब्राह्मणों को खरसाण गाँव का पट्टा दिया था, तभी वहा से इस जाती के लोग रहते है | श्यामलदास जी की रिपोर्ट के अनुसार उदयसिंह ने यह गाँव ब्राह्मणों को दिया जिसके पहले यह कभी राणा सांगा के शासन काल में भी इसी जाती के लोग की राजभक्ति के कारण से दिया जा चूका था | समय समय पर महराणा मेनारिया दी गई भूमि का नवीनीकरण करते थे | श्यामलदास कलेक्शन में राणा सांगा के समय यहाँ पर चार मेनारिया घर के मुखिया के नाम भी मिलते है – जो खेताजी के पुत्र थे , तभी से इसे खरान कहा जाता है | हीरा गोपावत के हस्ताक्षर युक्त पोती के आधार पर श्यामलदास जैसे इतिहासकार के खरसाण गाँव की विगत लिखी जो आज भी राजस्थान राज्य अभिलेखालर, बीकानेर में श्यामलदास कलेक्शन के नाम से संघ्राहित है |

चिरवा :

चिरवा गाँव मेवाड की प्राचीन राजधानी नागदा के निकट बड़ी आय वाला गाँव था | चिरवा के शिलालेख – यह वि. स. 1330 (इसवी 1273 ) कार्तिक सुदि 1 का है , जो इस गाँव ( उदयपुर से 10 मील उत्तर में ) के मंदिर के दिवार की तरफ लगा हुआ है | इसमें गुहिल्वंशी बाप्पा के वशधर पद्मसिंह, जेत्र सिंह , तेजसिंह और समर सिंह का वर्णन कर चारो राजाओं के समय नागदा या चित्तोड के ब्राह्मण तलारक्षो ( जो की इस क्षेत्र के रक्षक कहलाते है ) वंश का वर्णन अच्छी तरह से किया गया है | चिरवा का यह शिलालेख हारित ऋषि और उस के उत्तराधिकारीयों तथा नागदा एवं चिरवा में रहने वाले ब्राह्म ऋषियों की टूटी कड़ीयो का समजने का आधार है |

इस सभी गाँव के अलावा भी मेनारिया ब्राह्मणों के 52 गाँव सूचि में अन्य है – चोकड़ी, चोरवडी, पटोली, वाना, बाठेडा , रुन्डेडा, भाटोली , भावलियां, पानेरियों की मादडी आदि |मेनारिया समाज का आतीत से वर्त्तमान समय तक का एक लम्बा और एक गौरवपूर्ण इतिहस रहा है | जो इससे जुड़े 52 गांवों की सूचि से भी प्रमाणित है |

प्रत्येक गाँव के बीच या निकट निर्मित मंदिर , बावडियाँ एवं कुए बाघ – बगीचे, देवस्थान और तालाब आदि इसके पुरातात्विक साक्ष्य है |